अध्याय ८

हे तात! पितृहीन मेरी कौन रक्षा करेगा? आज मेरे भाई, बन्धु, माता आदि कोई भी नहीं है। हे तात! मेरे भोजन, वस्त्र की चिन्ता कौन करेगा? कैसे मैं रहूँगी, इस शून्य, वेद-ध्वनि-रहित ॥ ४२-४३ ॥

निर्जन वन की तरह आपके घर में। हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं मर जाऊँगी ऐसे जीने में क्या रक्खा है? ॥ ४४ ॥

हे कन्या में प्रेम रखने वाले पिता! हे तात! विवाहविधि बिना किए ही आप कहाँ चले गये? हे तपोनिधे! अब यहाँ आइये ॥ ४५ ॥

पितृहीनां च मां तात को वा सम्भावयिष्यति ॥ भ्राता नैव बन्धुश्च न मे माता तपस्विनी ॥ ४२ ॥

भोजनाच्छादने चिन्तां को मे तात करिष्यति ॥ कथं तिष्ठाम्यहं शून्ये वेदध्वनिविवर्जिते ॥ ४३ ॥

आश्रमे ते मुनिश्रेष्ठ अरण्य इव निर्जने ॥ अतः परं मरिष्योमि जीवने किं प्रयोजनम्‌ ॥ ४४ ॥

असम्पाद्यैव वैवाहं विधिं दुहितृवत्सल ॥ क्क गतोऽसि पितस्तात इहागच्छ तपोनिधे ॥ ४५ ॥

वाणीं वद सुधाकल्पां कथं तूष्णीमवस्थितः ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ हे तात चिरं सुप्तोऽसि साम्प्रतम्‌ ॥ ४६ ॥

इत्युक्त्वाधऽश्रुमुखी बाला विललाप मुहुर्मुहुः ॥ मुक्तकण्ठं रुरोदार्ता कुररीव सुदुःखिता ॥ ४७ ॥

और अमृत के समान मधुर भाषण कीजिए। क्यों आप चुप हो गये! हे तात! बहुत देर से आप सोये हुए हैं अब जागिये ॥ ४६ ॥

ऐसा कहकर आँसू बहाती हुई घड़ी-घड़ी कन्या विलाप करने लगी और पिता के मरने से दुःखित हुई आर्ता, चील्ह पक्षी की तरह मुक्तकण्ठ से रोने लगी ॥ ४७ ॥

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