अध्याय ८

उस लड़की का रोदन सुन उस वन में रहने वाले ब्राह्मण आपस में कहने लगे कि इस तपोवन में अत्यन्त करुण शब्द से कौन रो रहा है? ॥ ४८ ॥

ऐसा कहकर सब तपस्वी चुप होकर ‘यह मेधावी ऋषि की कन्या का शब्द है’ ऐसा निश्चय कर घबड़ाये हुए हाहाकार करते मेधावी के घर में आये ॥ ४९ ॥

तत्सुतारोदनं श्रुत्वा विप्रास्तद्वनवासिनः ॥ अतीव करुणं को वा रोदित्यस्मिंस्तपोवने ॥ ४८ ॥

मेधाऋषेः सुताशब्दं शनैर्निश्चित्य तापसाः ॥ ससम्भ्रमाः समाजग्मुर्हाहाकारसमन्विताः ॥ ४९ ॥

आगत्य ददृशुः सर्वे सुताङ्कस्थं मृतं मुनिम्‌ ॥ ततः संरुरुदुः सर्वे मुनयः काननौकसः ॥ ५० ॥

सुतोत्सड्गाच्छवं नीत्वा श्मनशाने शिवसन्निधौ ॥ अन्त्ये ष्टिं विधिना कृत्वा तेऽदहम्‌ काष्ठवेष्टितम्‌ ॥ ५१ ॥

और वहाँ आकर सबने कन्या के गोद में मरे हुए मेधावी ऋषि को देखा और देख कर उस वन के रहने वाले सब मुनि भी रोने लगे ॥ ५० ॥

और कन्या की गोद से शव को लेकर शिव मन्दिर के पास श्मशान पर गये। वहाँ काष्ठ की चिता लगाकर विधि से अन्त्येष्टि कर्मकर उसका दाह किये ॥ ५१ ॥

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