अध्याय ९

सूतजी बोले – तदनन्तर विस्मय से युक्त नारद मुनि ने मेधावी ऋषि की कन्या का अद्‌भुत वृत्तान्त पूछा ॥ १ ॥

नारदजी बोले – हे मुने! उस तपोवन में मेधावी की कन्या ने बाद में क्या किया? और किस मुनिश्रेष्ठ ने उसके साथ विवाह किया? ॥ २ ॥

श्रीनारायण बोले – अपने पिता को स्मरण करते-करते और बराबर शोक करते-करते उस घर में कुछ काल उस कन्या का व्यतीत हुआ ॥ ३ ॥

सूत उवाच ॥ ततस्तं विस्मयाविष्टः पप्रच्छ नारदो मुनिः ॥ मेधाविद्विजवर्यस्य सुतावृत्तान्तमद्‌भुतम्‌ ॥ १ ॥

नारद उवाच ॥ मुने मुनिसुता तत्र किं चकार तपोवने ॥ को वा मुनिवरस्तस्याः पाणिग्रहमचीकरत्‌ ॥ २ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ निवसन्‍त्यास्ततस्तस्याः कियान्‌ कालो विनिर्गतः ॥ स्मारं स्मारं स्वपितरं शोचन्‍त्याश्च मुहुर्मुहुः ॥ ३ ॥

शून्यसद्मनि संविष्टां यूथभ्रष्टां मृगीमिव ॥ गलद्वाष्पौघनयनां ज्वलद्‌धृदयपङ्कजाम्‌ ॥ ४ ॥

विनिःश्वासपरां दीनां संरुद्धामुरगीमिव ॥ चिन्‍‍तयन्‍तीमपश्यन्‍तीं दुःखपारं कृशोदरीम्‌ ॥ ५ ॥

यूथ से भ्रष्ट हुई हरिणी की तरह घबड़ाई, शून्य घर में रहनेवाली, दुःखरूप अग्नि से उठी हुई भाफ द्वारा बहते हुए अश्रुनेत्र वाली, जलते हुए हृत्‍कमल वाली ॥ ४ ॥

दुःख से प्रतिक्षण गरम श्‍वास लेनेवाली, अतिदीना, घिरी हुई सर्पिणी की तरह अपने घर में संरुद्ध, अपने दुःख को सोचती और दुःख से मुक्त होने के उपाय को न देखती हुई उस कृशोदरी को ॥ ५ ॥

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