अध्याय ९

उसके शुभ भविष्य की प्रेरणा से सान्‍त्वना देने के लिए उस वन में अपनी इच्छा से ही परक्रोधी – जिनको देखने से ही इन्द्र भयभीत होते हैं – ऐसे, जटा से व्याप्त, साक्षात्‌ शंकर के समान भगवान्‌ दुर्वासा ऋषि आये ॥ ६-७ ॥

हे नारद! भगवान्‌ कृष्ण ने राजा युधिष्ठिर से कहा कि हे राजेन्द्र! वह दुर्वासा आये जिसको कि आपकी माता कुन्ती ने बालापन में प्रसन्न किया था। तब उन सुपूजित महर्षि ने देवताओं को आकर्षण करने वाली विद्या उन्हें दी और हे भूपाल! जिन्होंने सब देवताओं से नमस्कार किए जाने वाले मुझको भी रुक्मिणी के साथ रथ में बैलों की जगह जोता ॥ ८-९ ॥

तामाससाद भगवान्‌ भविष्यद्‌बलनोदितः ॥ यदृच्छया वने तस्मिन्‌ परमः कोपनो मुनिः ॥ ६ ॥

यद्विलोकनमात्रेण त्रस्येदपि शतक्रतुः ॥ जटाकलापसञ्छन्नः साक्षादिव सदाशिवः ॥ ७ ॥

यस्त्वज्जनन्या राजेन्द्र शैशवेऽतिप्रसादितः ॥ त्रिदशाऽऽकर्षिणीं विद्यां ददावस्यै सुपूजितः ॥ ८ ॥

येनाहमपि भूपाल सर्वदेवनमस्कृतः ॥ रथे संयोजितः साक्षाद्रुक्मिण्या सह नारद ॥ ९ ॥

उभाभ्यां चालिते मार्गे रथे दुर्वाससान्विते ॥ अत्युग्रया तृषा शुष्यत्ताल्वोष्ठपुटयाऽनया ॥ १० ॥

सूचितोऽहं जलार्थिन्या स्कन्धस्थयुगया पुरा ॥ गच्छन्नेव पदाग्रेण सम्पीङ्य वसुधातलम्‌ ॥ ११ ॥

दुर्वासा को बैठाकर रथ खींचते हुए जब हम दोनों मार्ग चलने लगे तब चलते-चलते मार्ग में अति तीव्र प्यास से सूख गये थे तालु और ओष्ठ जिस रुक्मिणी के ऐसी जल चाहने वाली रुक्मिणी ने जब मुझे सूचित किया तब कन्धे पर रथ की जोत को रखे हुए चलते-चलते ही पाँव के अग्रभाग से पृथ्वी को दबा कर ॥ १०-११ ॥

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