अध्याय ९

रुक्मिणी के प्रेम के वशीभूत मैंने भोगवती नाम की नदी को उत्पन्न किया। तब वही भोगवती ऊपर से बहने लगी। अनन्तर उसी के जल से ॥ १२ ॥

हे महाराज! रुक्मिणी की प्यास को मैंने बुझाया। इस प्रकार रुक्मिणी की प्यास का बुझना देख उसी क्षण अग्नि की तरह दुर्वासा क्रोध से जलने लगे ॥ १३ ॥

और प्रलय की अग्नि के समान उठकर दुर्वासा ने शाप दिया। बोले बड़ा आश्‍चर्य है, हे श्रीकृष्ण! रुक्मिणी तुमको सदा अत्यन्त प्रिय है ॥ १४ ॥

आनीतवान्‌ भोगवतीं प्रियाप्रेमपरिप्लुतः ॥ सैवोर्ध्वगामिनी भूत्वा तावन्मात्रेण वारिणा ॥ १२ ॥

न्यवारयन्महाराज रुक्मिणीतृषमुल्बणम्‌ ॥ तद्‌दृष्ट्वा तत्क्षणोत्पन्नक्रोधेन प्रज्वलन्निव ॥ १३ ॥

प्रलयाग्निरिवोत्तिष्ठन्‌ शशाप कोपनो मुनिः ॥ अहो श्रीकृष्ण तेऽत्यन्तं वल्लभा रुक्मिणी सदा ॥ १४ ॥

यद्भवान्‌ मामवज्ञाय प्रियाप्रेमपरिप्लुतः ॥ पाययामास पानीयं माहात्म्यं दर्शयन्‌ स्वकम्‌ ॥ १५ ॥

दम्पत्योरुभयोरेव वियोगोऽस्तु युधिष्ठिर ॥ इति यो दत्तवान्‌ शापं स एव मुनिसत्तमः ॥ १६ ॥

साक्षाद्रुद्रांशसम्भूतः कालरुद्र इवापरः ॥ अत्रेरुग्रतपः कल्पवृक्षदिव्यफलं महत्‌ ॥ १७ ॥

अतः स्त्री के प्रेम से युक्त तुमने मेरी अवज्ञा कर अपना महत्व दिखलाते हुए इस प्रकार से उसे पानी पिलाया ॥ १५ ॥

अतः तुम दोनों का वियोग होगा, इस प्रकार उन्होंने शाप दिया था। हे युधिष्ठिर! वही यह दुर्वासा मुनि हैं ॥ १६ ॥

साक्षात्‌ रुद्र के अंश से उत्पन्न, दूसरे कालरुद्र की तरह, महर्षि अत्रि के उग्र तपरूप कल्पवृक्ष के दिव्य फल ॥ १७ ॥

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