अध्याय ९

पतिव्रताओं के सिर के रत्‍न, अनुसूया भगवती के गर्भ से उत्पन्न, अत्यन्त मेधायुक्त दुर्वासा नाम के ऋषि ॥ १८ ॥

अनेक तीर्थों के जल से भींगी हुई जटा से भूषित सिर वाले, साक्षात्‌ तपोमूर्ति दुर्वासा ऋषि को आते देखकर कन्या ने शोकसागर से ॥ १९ ॥

निकल कर धैर्य से मुनि के चरणों में प्रार्थना की। प्रार्थना करने के बाद जैसे बाल्मीकि ऋषि को जानकी अपने आश्रम में लाई थीं वैसे ही यह भी दुर्वासा को अपने घर में लाकर ॥ २० ॥

पतिव्रताशिरोरत्नाऽनुसूयागर्भसम्भवः ॥ दुर्वासा नाम मेधावी यथा वै मूर्तिमत्तपः ॥ १८ ॥

नैकतीर्थजलक्लिन्न जटाभूषितसच्छिराः ॥ तमालोक्य समायान्तं कुमारी शोकसागरात्‌ ॥ १९ ॥

उन्मज्ज्योत्थाय धैर्येण ववन्दे चरणौ मुनेः ॥ नत्वा स्वाश्रममानीय बाल्मीकिं जानकी यथा ॥ २० ॥

अर्ध्यपाद्यैर्वन्यफलैः पुष्पैश्च विविधैर्मुनिम्‌ ॥ स्वागतं पृच्छय सा बाला पूजयामास सादरम्‌ ॥ ततः सविनया राजन्नुवाच मुनिकन्यका ॥ २१ ॥

बालोवाच ॥ नमस्तेऽस्तु महाभाग अत्रिगोत्रदिवाकर ॥ कुतोऽधिगमनं साधो दुर्दैवाया ममाश्रमे ॥ मम भाग्योदयो जातस्तवागमनतो मुने ॥ २२ ॥

अर्ध्य, पाद्य और विविध प्रकार के जंगली फलों और पुष्पों से स्वागत के लिए आज्ञा लेकर आदरपूर्वक पूजन कर तदनन्तर हे राजन्‌! यह बाला बोली ॥ २१ ॥

कन्या बोली – हे महाभाग! हे अत्रि कुल के सूर्य! आपको प्रणाम है। हे साधो! मेरी अभाग्या के घर में आज आपका शुभागमन कैसे हुआ? हे मुने! आपके आगमन से आज मेरा भाग्योदय हुआ है ॥ २२ ॥

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