अध्याय ९

अथवा मेरे पिता के पुण्य के प्रवाह से प्रेरित मुझे सान्त्वना देने के लिये ही आप मुनिसत्तम आये हैं ॥ २३ ॥

आप ऐसे महात्माओं के पाँव की धूल जो है वह तीर्थरूप है उस धूल का स्पर्श करने वाली मैं अपना जन्म आज सफल कर सकी हूँ, आज मेरा व्रत भी सफल है ॥ २४ ॥

आप ऐसे पुण्यात्मा के जो मुझे आज दर्शन हुए। अतः आज मेरा उत्पन्न होना और मेरा पुण्य सफल है ॥ २५ ॥

अथवा मत्पितुः पुण्यप्रवाहप्रेरितो भवान्‌ ॥ सम्भावयितुं मामेव ह्यागतो मुनिसत्तमः ॥ २३ ॥

भवादृशां पादरजस्तीर्थरूपं महात्मनाम्‌ ॥ स्पृशन्‍त्याः सफलं जन्म सफलं चाद्य मे व्रतम्‌ ॥ २४ ॥

अद्य मे सफलं पुण्यमद्य मे सफलो भवः ॥ भवादृशा महापुण्या यन्मे दृष्टिपथं गताः ॥ २५ ॥

एवमुक्‍त्वा च सा बाला तस्थौ तूष्णीं तदग्रतः ॥ सस्मितं मुनिराहेदं दुर्वासाः शङ्करांशजः ॥ २६ ॥

दुर्वासा उवाच ॥ साधु साधु द्विजसुते कुलमभ्युद्‌धृतं पितुः ॥ मेधाऋषेः सुतपसः फलमेतादृशी सुता ॥ २७ ॥

कैलासादहमागच्छं ज्ञात्वा ते धर्मशीलताम्‌ ॥ त्वदाश्रममनुप्राप्तस्त्वया सम्पूजितोऽस्म्यहम्‌‌ ॥ २८ ॥

ऐसा कहकर वह कन्या दुर्वासा के सामने चुपचाप खड़ी हो गयी। तब भगवान्‌ शंकर के अंश से उत्पन्न दुर्वासा मुनि मन्द हास्य युक्त बोले ॥ २६ ॥

दुर्वासा बोले – हे द्विजसुते! तू बड़ी अच्छी है तूने अपने पिता के कुल को तार दिया। यह मेधावी ऋषि के तप का फल है। जो उन्हें तेरी ऐसी कन्या उत्पन्न हुई ॥ २७ ॥

तेरी धर्म में तत्परता जान कैलास से मैं यहाँ आया और तेरे घर आकर तेरे द्वारा मेरा पूजन हुआ ॥ २८ ॥

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