अध्याय ९

हे वरारोहे! मैं शीघ्र ही बदरिकाश्रम में मुनीश्‍वर सनातन, नारायण, देव के दर्शन के लिये जाऊँगा जो प्राणियों के हित के लिए अत्यन्त उग्र तप कर रहे हैं। कन्या बोली – हे ऋषे! आपके दर्शन से ही मेरा शोकसमुद्र सूख गया ॥ २९-३० ॥

अब इसके बाद मेरा भविष्य उज्ज्वल है; क्योंकि आपने मुझे सान्‍त्वना दी, हे मुने! मेरी उस प्रादुर्भूत बड़ी भारी ज्वाला युक्त दुःख रूप अग्नि को क्या आप नहीं जानते हैं? हे दयासिन्धो! हे शंकर! उस दुःखाग्नि को शान्त कीजिये। मेरे विचार से हर्ष का कारण मुझे कुछ भी दिखलाई नहीं देता ॥ ३१-३२ ॥

गमिष्यामि वरारोहे शीघ्रं बदरिकाश्रमम्‌ ॥ द्रष्दुं नारायणं देवं सनातनमुनीश्वरम्‌ ॥ २९ ॥

तपश्‍चरन्तमेकाग्रमत्युग्रं लोकहेतवे ॥ बालोवाच ॥ ऋषे त्वद्दर्शनादेव शुष्को मे शोकसागरः ॥ ३० ॥

अतः परं शुभं भावि यस्मात्‌ सम्भाविता त्वया ॥ समुद्भूतबृहज्ज्वाल दुःखहव्यभुजं मुने ॥ ३१ ॥

कि न वेत्सि दयासिन्धो तन्निर्वापय शङ्कर ॥ हर्ष हेतुर्न मे कश्चिद्‌ दृश्यते सुविचारतः ॥ ३२ ॥

न माता न पिता भ्राता यो मे धैर्यं प्रयच्छति ॥ कथङ्कारमहं जीवे दुःखसागरपीडिता ॥ ३३ ॥

यां यां दिशं प्रपश्यामि सा सा शून्या विभाति मे ॥ मम दुःखप्रतीकारं कुरु शीघ्रं तपोनिधे ॥ ३४ ॥

न मुझे माता है, न पिता, न तो भाई है, जो धैर्य प्रदान करता, अतः दुःख समुद्र से पीड़ित मैं कैसे जीवित रह सकती हूँ? ॥ ३३ ॥

जिस-जिस दिशा में मैं देखती हूँ वह-वह दिशा मुझे शून्य ही प्रतीत होती है, इसलिये हे तपोनिधे! मेरे दुःखका निस्तार आप शीघ्र करें ॥ ३४ ॥

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