अध्याय ९

मेरे साथ विवाह करने के लिए कोई भी नहीं तैयार होता है। इस समय मेरा विवाह न हुआ तो मैं फिर वृषली शूद्रा हो जाऊँगी यह मुझे बड़ा भय है ॥ ३५ ॥

इसी भय से न मुझे निद्रा आती है और न भोजन में मेरी रुचि होती है, हे ब्रह्मन्‌! अब मैं शीघ्र ही मरने वाली हूँ, यह मेरा इस समय निश्चय है ॥ ३६ ॥

ऐसा कहकर आँसू बहाती हुई कन्या दुर्वासा के सामने चुप हो गयी तब दुर्वासा कन्या का दुःख दूर करने का उपाय सिचने लगे ॥ ३७ ॥

न मां कामयते कश्चित्‌ पाणिग्रहणहेतवे ॥ अतः परं भविष्यामि वृषलीति महद्भयम्‌ ॥ ३५ ॥

तस्मान्न जायते निद्रा न रुचिर्भोजने मम ॥ ब्रह्मन्‌ मुमूर्षुरस्म्येव इति मे निश्चयोऽधुना ॥ ३६ ॥

इत्युक्‍त्वाश्रुमुखी बाला विरराम तदग्रतः ॥ दुर्वासास्तदुपायाथ विचारमकरोत्तदा ॥ ३७ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इति मुनितनयावचो निशम्य बहुतलमा मुनिराड्‌ विचार्य छन्दः ॥ अतिशयकृपया विलोक्य बालां किमपि हितं निजगाद सारभूतम्‌ ॥ ३८ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये दुर्वाससस्तपोवनगमनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार मुनि कन्या के वचन सुनकर और इसका अभिप्राय समझ कर बड़े क्रोधी मुनिराज दुर्वासा ने उस कन्या का कुछ हित विचार पूर्ण कृपा से उसे देखकर सारभूत उपाय बतलाया ॥ ३८ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये नवमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ९ ॥

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