अध्याय १

इधर मुनि लोगों ने शुकदेव के लिए बड़ा ऊँचा और उत्तम आसन बिछाया। उस आसन पर बैठे हुए भगवान् शुक को कमल की कर्णिका को जैसे कमल के पत्ते घेरे रहते हैं उसी प्रकार मुनि लोग उनको घेर कर बैठ गये ॥ ५२ ॥

आसनं कल्पयाञ्चकुः शुकायोन्नतमुत्तमम्‌ ॥ आसेदुर्मुनयोऽम्भोजकणिकायश्छ्दाइव ॥ ५२ ॥

तत्रोपविष्टो भगवान्‌ महामुनिर्व्यासात्मजो ज्ञानमहाब्धिचन्द्रमाः ॥ पूजां दधद्‌ब्राह्मण कल्पितां तदा रराजतारावृत्तचन्द्रमा इव ॥ ५३ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये शुकागमने प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

यहाँ बैठे हुए ज्ञानरूप महासागर के चन्द्रमा भगवान् महामुनि व्यासजी के पुत्र शुकदेव ब्राह्मणों द्वारा की हुई पूजा को धारण कर तारागणों से घिरे हुए चन्द्रमा की तरह शोभा को प्राप्त होते भये ॥ ५३ ॥

इति बृहन्नारदीये श्रीपुरुषोत्तममाहात्म्ये प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥ १ ॥

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