अध्याय १

शाण्डीर, करुण, काल, कैवल्य, कलाधार, श्‍वेतबाहु, रोमपाद, कद्रु, कालाग्निरुद्रग ॥ १२ ॥

श्‍वेताश्‍वर, आद्य, शरभंग, पृथुश्रवस् आदि शिष्यों के सहित ये सब ऋषि अंगों के सहित वेदों को जानने वाले, ब्रह्मनिष्ठ ॥ १३ ॥

संसार की भलाई तथा परोपकार करने वाले, दूसरों के हित में सर्वदा तत्पर, श्रौत, स्मार्त कर्म करने वाले ॥ १४ ॥

शाण्‍डीरः करुणः कालः कैवल्यश्च कलाधरः ॥ श्‍वेतबाहू रोमपादः कद्रुः कालाग्निरुद्रगः ॥ १२ ॥

श्‍वेताश्वतर एवाद्यः शरभङ्ग पृथुश्रवाः ॥ एते सशिष्‍या ब्रह्मिष्ठा वेदवेदाङ्गपारगाः ॥ १३ ॥

लोकानुग्रहकर्तारः परोपकृतिशालिनः ॥ परप्रियरताश्‍चैव श्रौतस्‍मार्तपरायणाः ॥ १४ ॥

नैमिषारण्‍यमासाद्य सत्रं कर्तुं समुद्यताः ॥ तीर्थयात्रामथोद्दिश्‍य गेहात्‌ सूतोऽपि निर्गतः ॥ १५ ॥

पृथिवीं पर्यटन्नेव नैमिषे दृष्टवान्‌ मुनीन्‌ ॥ तान्‌ सशिष्‍यान्नमस्‍कर्तुं संसारार्णवतारकान्‌ ॥ १६ ॥

सूतः प्रहर्षितः प्रागाद्यत्रासंस्ते मुनीश्वराः ॥ ततः सूतं समायान्तं रक्तवल्कलधारिणम्‌ ॥ १७ ॥

नैमिषारण्य में आकर यज्ञ करने को तत्पर हुए। इधर तीर्थयात्रा की इच्छा से सूत जी अपने आश्रम से निकले ॥ १५ ॥

और पृथ्वी का भ्रमण करते हुए उन्होंने नैमिषारण्य में आकर शिष्यों के सहित समस्त मुनियों को देखा। संसार समुद्र से पार करने वाले उन ऋषियों को नमस्कार करने के लिये ॥ १६ ॥

पहले से जहाँ वे इकट्‌ठे थे वहीं प्रसन्नचित्त सूतजी भी जा पहुँचे ॥ १७ ॥

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