अध्याय १

इसके अनन्तर पेड़ की लाल छाल को धारण करने वाले, प्रसन्नमुख, शान्त, परमार्थ विशारद, समग्र गुणों से युक्त, सम्पूर्ण आनन्दों से परिपूर्ण ॥ १८ ॥

ऊर्ध्वपुण्‍ड्रघारी, राम नाम मुद्रा से युक्त, गोपीचन्दन मृत्तिका से दिव्य, शँख, चक्र का छापा लगाये ॥ १९ ॥

तुलसी की माला से शोभित, जटा-मुकुट से भूषित, समस्त आपत्तियों से रक्षा करने वाले, अलौकिक चमत्कार को दिखाने वाले, भगवान् के परम मन्त्र को जपते हुए ॥ २० ॥

प्रसन्नवदनं शान्तं परमार्थविशारदम्‌ ॥ अशेषगुणसम्पन्नमशेषानन्दसस्प्लुतम्‌ ॥ १८ ॥

ऊर्ध्वपुण्‍ड्रधरं श्रीमन्नाममुद्राविराजितम्‌ ॥ शङ्खचक्रधरं दिव्यं गोपीचन्दनमृत्स्नया ॥ १९ ॥

लसच्‍छ्रीतुलसीमालं जटामकुटमण्‍द्दितम्‌ ॥ जपन्तं परमं मन्त्रं हरेः शरणमद्‍भुतम्‌ ॥ २० ॥

सर्वशास्त्रार्थसारज्ञं सर्वलोकहि ते रतम्‌ ॥ जितेन्द्रियं जितक्रोधं जीवन्मुक्‍तं जग द्‌गुरुम्‌ ॥ २१ ॥

व्यासप्रसादसम्पन्नं व्यासवद्विगतस्पृहम्‌ ॥ तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय नैमिषेयां महर्षयः ॥ २२ ॥

श्रोतुकामाः समावब्रुविचित्रा विविधाः कथाः ॥ ततः सूतो विनीतात्मा सर्वानृषिवरान्‌ ॥ बद्घाञ्जलिपुटो भूत्वा ननाम दण्डन्मुहुः ॥ २३ ॥

समस्त शास्त्रों के सार को जानने वाले, सम्पूर्ण प्राणियों के हित में संलग्न, जितेन्द्रिय तथा क्रोध को जीते हुए, जीवन्मुक्त, जगद्‍गुरु ॥ २१ ॥

श्री व्यास की तरह और उन्हीं की तरह निःस्पृह्‌ आदिगुणों से युक्त उनको देख उस नैमिषारण्य में रहने वाले समस्त महर्षिगण सहसा उठ खड़े हुए ॥ २२ ॥

विविध प्रकार की विचित्र कथाओं को सुनने की इच्छा प्रगट करने लगे। तब नम्रस्वभाव सूतजी प्रसन्न होकर सब ऋषियों को हाथ जोड़कर बारम्बार दण्डवत् प्रणाम करते भये ॥ २३ ॥

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