अध्याय १

ऋषि लोग बोले – हे सूतजी! आप चिरन्जीवी तथा भगवद्भक्त होवो। हम लोगों ने आपके योग्य सुन्दर आसन लगाया है ॥ २४ ॥

हे महाभाग! आप थके हैं, यहाँ बैठ जाइये, ऐसा सब ब्राह्मणों ने कहा। इस प्रकार बैठने के लिए कहकर जब सब तपस्वी और समस्त जनता बैठ गयी ॥ २५ ॥

ऋषय ऊचुः – सूत सूत चिरञ्जीव भव भागवतो भवान्‌ ॥ अस्माभिस्त्वासनं तेऽद्य कल्पितं सुमनोगरम्‌ ॥ २४ ॥

अत्रास्यतां महाभाग श्रान्‍तोऽसीत्यवदन्‌ द्विजाः ॥ ततस्तु सूपविष्‍टैषु सर्वेषु च तपस्विषु ॥ २५ ॥

तपोवृद्धास्ततः दृष्ट्वा सर्वान्‌ मुनिगणान्‌ मुदा ॥ निर्दिष्टमासनं भेजे विनयाद्रौमहर्षणिः ॥ २६ ॥

सुखासीनं ततस्तं तु विश्रान्तमुपलक्ष्य च ॥ श्रोतुकामाः कथाः पुण्‍या इदं वचनमब्रुवन्‌ ॥ २७ ॥

ऋषय ऊचुः ॥ सूत सुत महाभाग भाग्यवानसि साम्प्रतम्‌ ॥ पाराशर्यवचा हार्दं त्वं वेद कृपया गुरोः ॥ २८ ॥

तब विनयपूर्वक तपोवृद्ध समस्त मुनियों से बैठने की अनुमति लेकर प्रसन्न होकर आसन पर सूतजी बैठते भये ॥ २६ ॥

तदनन्तर सूत को सुखपूर्वक बैठे हुए और श्रमरहित देखकर पुण्यकथाओं को सुनने की इच्छा वाले समस्त ऋषि यह बोले ॥ २७ ॥

ऋषि लोग बोले – हे सूतजी! हे महाभाग! आप भाग्यवान् हैं। भगवान् व्यास के वचनों के हार्दि्‌क अभिप्राय को गुरु की कृपा से आप जानते हैं ॥ २८ ॥

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