अध्याय १

क्या आप सुखी तो हैं? आज बहुत दिनों के बाद कैसे इस वन में पधारे? आप प्रशंसा के पात्र हैं। हे व्यासशिष्यशिरोमणे! आप पूज्य हैं ॥ २९ ॥

इस असार संसार में सुनने योग्य हजारों विषय हैं परन्तु उनमें श्रेयस्कर, थोड़ा-सा और सारभूत जो हो वह हम लोगों से कहिये ॥ ३० ॥

हे महाभाग! संसार-समुद्र में डूबते हुओं को पार करने वाला तथा शुभफल देने वाला, आपके मन में निश्चित विषय जो हो वही हम लोगों से कहिये ॥ ३१ ॥

सुखी कच्चिद्भवानद्य चिराद्‍दृष्टः कथं वने ॥ श्‍लाघनीयोऽसि पूज्योऽसि व्यासशिष्यशिरोमणे ॥ २९ ॥

संसारेऽस्मिन्नसारे तु श्रोतब्यानि सहस्रशः ॥ तत्र श्चेयस्करं स्वल्पं सारभूतं च यद्भवेत्‌ ॥ ३० ॥

तन्नो वद महाभाग यत्ते मनसि निश्चितम्‌ ॥ संसारोर्णवमग्नानां पारदं शुभदं च यत्‌ ॥ ३१ ॥

अज्ञानतिमिरान्धानां नेत्रदानपरायण ॥ वद शीघ्रं कथासारं भवरोगरसायनभ्‌ ॥ ३२ ॥

हरिलीलारसोपेतं परमानन्दकारणम्‌ ॥ एवं पृष्टः शौनकाद्यैः सूतः प्रोवाच प्राञ्जलिः ॥ ३३ ॥

सूत उवाच ॥ श्रृण्वन्तु मुनयः सर्वे मदुक्तं सुमनोहरम्‌ ॥ आदावहं गतो विप्रास्तीर्थं पुष्‍करसंज्ञितम्‌ ॥ ३४ ॥

हे अज्ञानरूप अन्धकार से अन्धे हुओं को ज्ञानरूप चक्षु देने वाले! भगवान् के लीलारूपी रस से युक्त, परमानन्द का कारण, संसाररूपी रोग को दूर करने में रसायन के समान जो कथा का सार है वह शीघ्र ही कहिये। इस प्रकार शौनकादिक ऋषियों के पूछने पर हाथ जोड़कर सूतजी बोले ॥ ३२-३३ ॥

सूतजी बोले – हे समस्त मुनियों! मेरी कही हुई सुन्दर कथा को आप लोग सुनिये। हे विप्रो! पहिले मैं पुष्कर तीर्थ को गया ॥ ३४ ॥

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