अध्याय १

पुनः चर्मण्वती में स्‍नान कर पीछे सेतुबन्ध रामेश्‍वर पहुँचा। तदनन्तर नारायण का दर्शन करने के हेतु बदरी वन गया ॥ ४० ॥

तब नारायण का दर्शन कर, वहाँ तपस्वियों को अभिनन्दन कर, पुनः नारायण को नमस्कार कर और उनकी स्तुति कर सिद्धक्षेत्र पहुँचा ॥ ४१ ॥

इस प्रकार बहुत से तीर्थों में घूमता हुआ कुरुदेश तथा जांगल देश में घूमता-घूमता फिर हस्तिनापुर में गया ॥ ४२ ॥

गत्वा चर्मण्वतीं पश्चात्‌ सेतुबन्धमथागमम्‌ ॥ ततो नारायणं द्रष्‍टुं गतोऽहं बदरीवनम्‌ ॥ ४० ॥

ततो नारायणं दृष्ट्वा तापसानभिवाद्य च ॥ नत्वा स्तुत्वा च तं देवं सिद्धक्षेत्रमुपागतः ॥ ४१ ॥

एवमादिषु तीर्थेषु भ्रमन्नागतवान्‌ कुरून्‌ ॥ जाङ्गलं देशमासाद्य हस्तिनापुरगोऽभवम्‌ ॥ ४२ ॥

तत्रश्रुतं विष्‍णुरातो राज्यमुत्सृज्य जग्निमवान्‌ ॥ गङ्गातीरं महापुण्यमृषिभिर्बहुभिद्विजाः ॥ ४३ ॥

तत्र सिद्धाः समाजग्मुर्योगिनः सिद्धिभूष्णाः ॥ देवर्षयश्च तत्रैव निराहाराश्च केचन ॥ ४४ ॥

वाताम्बुपर्णाहाराश्च श्‍वासाहाराश्च केचन ॥ फलाहाराः परे केचित्‌ फेनाहाराश्‍च केचन ॥ ४५ ॥

हे द्विजो! वहाँ यह सुना कि राजा परीक्षित राज्य को त्याग बहुत ऋषियों के साथ परम पुण्यप्रद गंगातीर गये हैं ॥ ४३ ॥

और उस गंगातट पर बहुत से सिद्ध, सिद्धि हैं भूषण जिनका ऐसे योगिलोग और देवर्षि वहाँ पर आये हैं उसमें कोई निराहार ॥ ४४ ॥

कोई वायु भक्षण कर, कोई जल पीकर, कोई पत्ते खाकर, कोई   श्‍वास ही को आहार कर, कोई फलाहार कर और कोई-कोई फेन का आहार कर रहते हैं ॥ ४५ ॥

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