अध्याय १

हे द्विजो! उस समाज में कुछ पूछने की इच्छा से हम भी गये। वहाँ ब्रह्मस्वरूप भगवान् महामुनि, व्यास के पुत्र, बड़े तेजवाले, बड़े प्रतापी, श्रीकृष्ण के चरण-कमलों को मन से धारण किये हुए श्रीशुकदेव जी आये ॥ ४६-४७ ॥

उन १६ वर्ष के योगिराज, शँख की तरह कण्ठवाले, बड़े लम्बे, चिकने बालों से घिरे हुए मुखवाले, बड़ी पुष्ट     कन्धों की सन्धिवाले, चमकती हुए कान्तिवाले ॥ ४८ ॥

तं समाजं प्रष्‍टुकामस्तत्राहमगमं द्विजाः ॥ तत्राजगाम भगवान्‌ ब्रह्मभूतो महामुनिः ॥ ४६ ॥

व्यासपुत्रो महातेजाः शुकदेवः प्रतापवान्‌ ॥ श्रीकृष्‍णचरणाम्भोजे मनसो धारणां दधत्‌ ॥ ४७ ॥

तं द्वयष्टवर्षं योगेशं कम्बुकण्‍ठं मदोन्नतम्‌ ॥ स्निग्धालकावृतमुखं गूढजत्रुं ज्वलत्प्रभम्‌ ॥ ४८ ॥

अवधूतं ब्रह्मभूतं ष्ठीवद्भिर्बालकैर्वृतम्‌ ॥ स्त्रीगणैर्धूलिहस्तैश्च मक्षिकाभिर्गजो यथा ॥ ४९ ॥

धूलिधूसरसर्वाङ्गं शुकं दृष्ट्वा महामुनिम्‌ ॥ मुनयः सहसोत्तस्थुर्बद्धाञ्जलिपुटा मुदा ॥ ५० ॥

स्त्रियो मूढाश्च बालास्ते तं दृष्ट्वा दूरतः स्थिताः पश्चात्तापसमायुक्ताः शुकं नत्वा गृहान्‌ ययुः ॥ ५१ ॥

अवधूत रूपवाले, ब्रह्मरूप, थूकते हुए लड़कों से घिरे हुए मक्षिकाओं से जैसे मस्त हस्ती घिरा रहता है उसी प्रकार धूल हाथ में ली हुई स्त्रियों से घिरे हुए ॥ ४९ ॥

सर्वांग धूल रमाए महामुनि शुकदेव को देख सब मुनि प्रसन्नता पूर्वक हाथ जोड़ कर सहसा उठकर खड़े हो गये ॥ ५० ॥

इस प्रकार महामुनियों द्वारा सत्कृत भगवान् शुक को देखकर पश्चात्ताप करती (पछताती) हुई स्त्रियाँ और साथ के बालक जो उनको चिढ़ा रहे थे, दूर ही खड़े रह गये और भगवान् शुक को प्रणाम करके अपने-अपने घर के प्रति जाते भये ॥ ५१ ॥

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